डाकू और संत

5 months ago Vatan Ki Awaz 0

डाकूओ का एक सरदार संत का वेश बनाकर रहता था किंतु काम डाका डालने का करता था। उसके कई शिष्य थे। एक बार व्यपारियों  की एक टोली उसी रास्ते से गुजरी जहां डाकू रहते थे। डाकुओं ने सोचा कि आज तो घर बैठे ही शिकार मिल गया। डाकू घेरा डालकर उन्हें लगे।

डाकुओं का सरदार उस समय अपनी झोंपड़ी में बैठा माला जप रहा था। तभी एक व्यापारी डाकुओं को चकमा देकर अपनी अशर्फियों की थैली लेकर झोंपड़ी के भीतर आ गया। वह साधु वेशधारी डाकुओं के सरदार के पास जाकर बोला,” महात्मा जी! यहां डाकुओं ने घेरा डाल दिया है। कृपया थोड़ी देर के लिए आप यह अशर्फियां रख लीजिए। जब डाकू चले जाएंगे तो मैं अपनी थैली ले जाऊंगा।“

डाकुओं के सरदार ने उस व्यपारी से थैली को एक कोने  में रखने का संकेत किया। व्यपारी ने वह थैली कोने में रख दी। व्यपारियों को लूटने के बाद सारे डाकू सरदार की झोंपड़ी में अपने माल के बंटवारे के लिए आए। संयोगवश वह व्यपारी भी उसी समय वहां पहुंच गया। वहां डाकुओं को देखकर वह चौंक पड़ा। उसकी समझ में आ गया कि जिसे वह महात्मा समझ रहा था, वही डाकुओं का सरदार है। अत: व्यापारी ने वहां से निकल जाना ही उचित समझा। जैसे ही वह चलने को हुआ, वैसे ही सरदार ने आवाज लगाई,” सेठ जी! कहां जा रहे हैं? अपनी थैली तो लेते जाइए। कोई आपको कुछ नहीं कहेगा।“

जब व्यापारी थैली लेकर वहां से चला गया तो डाकुओं ने सरदार से कहा,” यह आपने क्या किया? घर आए मुर्गें को छोड़ दिया? अगर हम भी दया करने लगें तो जिंदा कैसे रहेंगे?”

तब डाकुओं के सरदार ने कहा,” साथियो! इस व्यपारी ने मुझे महात्मा समझकर मेरे पास अशर्फियों की थैली रखी थी क्योंकि मैं संत का वेश धारण किए रहता हूं। संत का वेश परमात्मा की याद दिलाने वाला वेश है। इस वेश को कहीं कलंक न लग जाए, इसलिए मैंने उसे उसकी थैली वापस लौटा दी।“

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