जीवन की चुनौती

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    पुराने समय की बात है। किसी गांव में एक बुढ़िया रहती थी। वह अत्यंत विपन्न थी। उसका पति लंबे समय से किसी लाइलाज बीमारी से जूझ रहा था। वह दिन-रात उसकी सेवा करती तथा मेहनत कर अपना और अपने पति का भरण-पोषण करती थी। गांव के लोग उसकी दशा पर मौखिक सहानुभूती व्यक्त करते थे लेकिन कोई मदद नहीं करते थे। वैसे भी वह बुढ़िया किसी के आगे हाथ फैलाना नहीं चाहती थी। एक दिन वह जंगल में लकड़ियां काटने गई। दिनभर वह किसी तरह लकड़ियां काटती रही। जब लकड़ियां जमा हो गईं तो वह उन्हें उठाने लगी। लेकिन वह लकड़ियों के गट्ठर को उठाने में असमर्थ थी। परेशा होकर बुढ़िया वहीं बैठ गई। उस् मन खिन्न हो गया। वह अपने भाग्य को कोसने लगी और मन ही मन कहने लगी, ऐसा जीवन जीने से क्या फायदा? अच्छा है, मुझे जल्दी उठा लो।

    तभी बुढ़िया ने देखा कि उसके सामने मौत आ खड़ी हुई है और कह रही है,” चलो उठो। तुम्हारी पुकार मैंने सुन ली है। अब मैं तुम्हें लेने आ गई हूं।“

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    मौत को सामने देखकर बुढ़िया चौंक गई। उसने मौत से कहा,” नहीं मुझे नहीं मरना है। मैं मर गई तो मेरे बीमार पति की देखभाल कौम करेगा? फिर मैं अभी इतनी कमजोर भी नही हूं कि कोई काम न कर सकूं। अभी मुझमें दमखम बाकी है। मैं अभी जीना चाहती हूं। मुझे अभी बहुत काम करने हैं। तुम मुझे छोड़ दो।“

    बुढ़िया के ऐसा कहते ही मौत चली गई। बढ़िया उठी। उसने दम लगाकर लकड़ियों का गट्ठर उठाया, उसे सिर पर पखा और घर चली आई। वह समझ नहीं पारही थी कि जो कुछ अभी-अभी हुआ वह कोई सपना था या सच। लेकिन उसे इस बात का एहसास हो गया था कि जीवन से भागना समस्या का समाधान नहीं है। जीवन की चुनौतियों को स्वीकार कर उनसे जूझना और अपना कर्म करते रहना ही प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है।

     

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