कर्तव्य

    0
    6

    भारत के एक प्रसिध्द संन्यासी यूरोप प्रवास के दौरान फ्रांस में थे। वहां उनकी मेजबान महिला ने उन्हें देश में भ्रमण कराने के लिए एक फिटन (घोड़ागाड़ी) किराये पर ली और दोनों पेरिस से बाहर एक गांव की ओर बढ़ने लगे। मार्ग में कोचवान ने फिटन एक जगह रोकी और नीते उतरा। मेजबान महिला ने देखा कि एक आया कुछ बच्चों को ले जा रही थी। वे बच्चे रईस घराने के लग रहे थे। कोचवान ने जाकर उन बच्चों को लाड़-दुलार किया और बतें करके वापस फिटन पर आ गया। मेजबान महिला को आश्चर्य हुआ। उसने कोचवान से पूछा,”ये बच्चे किसके हैं?”

    कोचवाम मे कहा,”ये मेरे ही बच्चे हैं। आपमे प्रसिध्द अमुक बैंक का नाम सुना ही होगा। वह बैंक मेरा था। पिछले दिनों मुझे काफी घाटा हो गया था। इस कारण बैंक बंद करना पड़ा मैंने इस गांव में एक मकान किराये पर ले लिया है जहां मेरी पत्नी,बच्चे एंव एक आया रहती है। मैं यह फिटन चलाकर अपने परिवार का पालन-पोषण करता हूं। मुझे कुछ लेनदारों से पैसा लेना है। जब वह रकम मुझे मिल जाएगी तब मैं सबका कर्ज चुकाकर फिर से बैंक चालू कर दूंगा।“

    कोचवान की बात सुनकर वह संन्यासी बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा है कि जिस वेदांत दर्शन की हम बात करते हैं, उस पर अमल मुझे उस बैंक मालिक के आचरण में देखने को मिला। एक सच्चे कर्मयोगी की तरह वह व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी नहीं डगमगाया और निर्भयता से अपने कर्म एवं दायित्वों का निर्वाह करता रहा। वेदांत दर्शन की यथार्थ शिक्षा यही है कि हम परिणामों की चिंता किए बिना और उनसे प्रभावित हुए बगैर निरंतर अपने कर्तव्य करते रहें। अपना आत्मिक सुख न गंवाएं और जीवन के हर उतार-चढ़ाव को सहज रूप में लें। प्रतिकूल परिस्थितियों का निर्भयता से सामना करने का मार्ग ही आध्यात्मिकता है।