कर्तव्य की श्रेष्ठता

5 months ago Vatan Ki Awaz 1

एक वकील थे। उनकी वकालत खूब चलती थी। एक बार वे एक हत्या का मुकदमा लड़ रहे थे, तभी गांव में उनकी पत्नी बिमार हो गई। बिमारी गभीर थी, इस कारण वकील साहब गांव पहुंच गए। वे अपनी पत्नी की देखभाल में लगे हुए थे, तभी मुकदमे की तारीख पड़ी। वकील साहब चिंता में पड़ गए। अगर वे पेशी पर नहीं पहुंचे तो उनके मुवक्किल को फांसी की सजा हो सकती थी। पति को असमंजस में पड़ा देख पत्नी ने कहा,” आप मेरी चिंता न करें। पेशी पर शहर जरूर जाएं। भगवान सब अच्छा करेंगे।“

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मुकदमा लड़ने के लिए वकील साहब दुखी मन से शहर चले गए। अदालत में मुकदमा पेश हुआ। सरकारी वकील ने दलीलें देकर यह साबित करने की कोशिश की मुलजिम

कसूरवार है और इसके लिए फांसी से कम कोई सजा नहीं हो सकती।

वकील साहब बचाव पक्ष की ओर से बहस करने लगे। थोड़ी देर के बाद उनके सहायक  एक टेलीग्राम लाकर उनके हाथ में दे दिया। वकील साहब कुछ क्षण के लिए रूके। उन्होंने तार पढ़कर अपने कोट की जेब में रख लिया और फिर से बहस करने में लग गए। अपनी बहस में उन्होंने यह साबित कर दिया कि उनका मुवक्किल निरपराध है और उसे रिहा कर दिया जाए।

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बहस के बाद मजिस्ट्रेट ने अपना फैसला सुनाया,” मुलजिम बेकसूर है, उसे छोड़ दिया जेए।“ मुवक्किल, उसके साथी और दूसरे वकील मित्र अदालत के बाद बधाई देने के लिए वकील साहब के कमरे में आए। वकील साहब ने अपने मित्रों को वह तार दिखाया। तार में लिखा था-“ आपकी पत्नी का देहांत हो गया है।“

इसके बाद वकील साहब ने उन्हें सारी बात बता दी। इस पर उनके मित्रों ने कहा,” आपको अपनी बीमार पत्नी को छोड़कर नहीं आना चाहिए था।“

वकील साहब ने कहा,” दोस्तो! अपनत्व से बड़ा कर्तव्य होता है और कर्तव्य निभाने से ही असली सुख प्राप्त होता है। “ वे वकील थे- भारत की एकता और अखंडता के निर्माता लौहपुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल।

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