ईमानदार चरवाहा

5 months ago Vatan Ki Awaz 0

प्रसिद्ध सूफी संत उमर अपने पास आने वाले शिष्यों और आगंतुकों की परीक्षा लेते थे। वे उत्तर देने में उन्हें थोड़ी परेशानी होती थी। फिर संत उमर स्वयं उसका समाधान करते थे इसके पीछे संत उमर का उद्धेश्य परोपकार या लोकहित का संदेश देना होता था।

एक बार उमर बगदाद स्थित अपने ठिकाने से जंगल की ओर जा रहे थे। मार्ग में उन्हें एक चरवाहा मिला जो भेड़-बकरियां चरा रहा था। उमर ने उसकी परीक्षा लेने का निर्णय किया। वे उस चरवाहे के पास पहुंचे और उससे कहा, ” तुम अपनी इन बकरियों में से एक छोटी बकरी मुझे दे दो।“  चरवाहे ने अपने मालिक का हवाला देकर ऐसे करने में अपनी असमर्थता जताई। तब उमर ने कहा,” यदि इतनी बकरियों में से एक कम हो जाएगी तो तुम्हे मालिक को पता नहीं चलेगा।“

लेकिन चरवाहा टस से मस न हुआ। उसने कहा,” हुजूर! मेरा मालिक तो यहां नहीं है लेकिन भगवान तो सारी दुनिया का मालिक है। वह मुझे देख रहा है। यदि मैं एक भी बकरी आपको दे दूंगा तो चाहे मेरे मालिक को पता न चले लेकिन उस सबके मालिक को पता अवश्य चल जाएगा। तब मेरे ऊपर विश्वास का क्या होगा? इसलिए आप मुझे माफ करें।“

चरवाहे के उत्तर से उमर प्रसन्न हो गए। परीक्षा में चरवाहा खरा उतरा। उमर उसे लेकर उसके मालिक के पास पहुंचे। उन्होंने उसके मालिक को सारा किस्सा सुनाया। वह चरवहा गुलाम था। उमर ने उसके मालिक से कहा, ” तुमने इस खुदा के बंदे को गुलाम बनाकर बहुत बड़ा गुनाह किया है। जो लाख कहने के बाद सैकड़ों बकरियों में से एक भी बकरी देने को राजी न हो, उसकी ईमानदारी को सलाम करना चाहिए।“

उमर के समझाने पर चरवाहे के मालिक ने उसे गुलामी से मुक्त कर दिया  और कई बकरियों उसे उपहार में दीं। यह उमर के लिए बड़ा अच्छा दिन था। उनका परोपकाप का लक्ष्य पूरा हूआ ही, एक छोटे आदमी से बड़ी शिक्षा भी प्राप्त हुई।

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