इंसानियत

5 months ago Vatan Ki Awaz 0

किसी शहर के समीप एक होटल था जिसका मालिक लालचंद अत्यंत सज्जन और दयालु था। होटल से उसे अच्छी आमदनी हो जाती थी जिससे उसका गुजारा चल जाता था। घर परिवार में उसका कोई नहीं था। मां-बाप बहुत पहले चल बसे थे। भाई-बहन भी नहीं थे और उसने विवाह किया ही नहीं था।

लालचंद की एक खासियत थी। अपने होटल में आने वाले हर विकलांग की वह मुफ्त में भोजन कराता था। किसी विकलांग के आग्रह करने पर भी वह उससे पैसे नहीं लेता था। कई वर्षों तक इसी तरह विकलांगों की सेवा करके उसने बहुत पुण्य कमाया था। विकलांगों के दिलों से उसके लिए दुआएं निकलती थी।

लालचंद प्रतिदिन सुबह चिड़ियों को दाना-पानी देता था। उसके होटल के सामने सुबह-सवेरे दाना चुगने के लिए पक्षियों के आनेक झुंड इकट्ठे होते थे। उनकी चहचहाहट से पूरा वातावरण गुंजायमान हो जाता था। ग्राहकों के आने तक वह दाना चुगते पक्षियों को निहारता रहता था। ऐसा करने से उसके मन को बहुत शांति अनुभव होती थी। एक दिन एक सज्जन ने लालचंद से पूछा,”आप हर विकलांग को मुफ्त में खाना क्यों खिलाते हैं ? इससे तो आपको काफी नुकसान उठाना पड़ता होगा ?”

इस पर लालचंद ने कहा,” मैं प्रतिदिन दाना चुगती इन चिड़ियों को देखता हूं। कई बार मैंने नोट किया है कि किसी भी अपाहिज चिड़िया के आसपास का दाना अन्य चिड़िया नहीं चुगती। जब पहली बार मैंने यह दृश्य देखा तो मुझे लगा कि वे चिड़ियां होकर भी विकलांगों का इतना ध्यान रखती हैं तो इंसान हूं। मुझे लगा कि मैं अपने होटल में विकलांगों को मुफ्त खाना खिला सकता हूं। तभी से मैंने इस राह पर चलना शुरू कर दिया। मैं अपने होटल में विकलांगों को मुफ्त में खाना खिलाता हूं। ऐसा करके मुझे बड़ा सुकून सिलता है।“

लालचंद की बात सुनकर प्रश्नकर्ता सज्जन नतमस्तक हो गए।

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