आत्मनिर्भरता

5 months ago Vatan Ki Awaz 0

चंद्रपुर के राजा की मृत्यु के बाद उसके पुत्र सौरभ को राजगद्धी मिली। युवा सौरभ बेहद परेशान था।

वह समझ नहीं पा रहा था कि किसका विश्वास करे और किसका नहीं। उसे राज-काज चलाने में काफी परेशानी हो रही थी। एक दिन वह अपने महल के सबसे ऊपरी स्थान पर खड़ा था। तभी अचानक उसकी नजर महल के मार्ग पर पड़ी। उसने देखा कि लोगों का एक झुंड एक ही दिशा में चला जा रहा है। पूछने पर मालूम हुआ कि एक संत नगर के बाहर आध्यात्मिक प्रवचन देने वाले हैं। सब उन्हीं के प्रवचनों को सुनने के लिए जा रहे हैं। यह देख सौरभ के भीतर उत्सुकता जगी। वह भी वेश बदलकर सभा स्थल पर जा पहुंचे

सौरभ ने संत के प्रवचन को ध्यानपूर्वक सुना और अपने मन में असीम आनंद का अनुभव किया सभा समाप्त हुई और सभी श्रोता अपने-अपने घरों को लौट गए लेकिन सौरभ अपने स्थान पर बैठा रहा। संत जी अपनी कुटिया में जाने के लिए आसन से उठे, तभी उनका दुशाला कुर्सी की कील में फंसकर फट गया। संत जी अंदर गए और सुई धागा लेकर बाहर आए। वे दुशाले की सिलाई के लिए सुई में धागा डालने का प्रयास करने लगे यह देखकर सौरभ ने कहा,” महाराज! आपका यह दुशाला पुराना हो चुका है। यह मुझे दे दीजिए और मेरा आप ले लिजिए।“

संत ने उतर दिया,” वत्स! मुझे तुम्हारा नया दुशाला नही चाहिए। यदि तुम मेरी कोई मदद करना चाहते हो तो सूई मे धागा डाल दो।“

सौरभ ने सूई मे धागा डालकर संत को दे दिया। संत ने अपने दुशाले मे टांके लगाने के बाद कहा,”मनुष्य को किसी पर भी निर्भर नही रहना चाहिए। मै किसी भी कार्य के लिए दूसरों पर आश्रित नही रहता। वही व्यक्ति जीवन में सफल हो सकता है जो सबसे ज्यादा अपने ऊपर विश्वास करता हो।“

संत के ये शब्द सुनकर सौरभ के सारे संशय दूर हो गए। उस दिन के बाद उसने एक नये आत्मविश्वास के साथ राज-काज संभालना शुरू कर दिया।

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