श्राद्ध और श्रद्धा

4 weeks ago vatan 0

संत एकनाथ मानवता, दया और करूणा के पक्षधर थे। एक बार कि बात हैं कि उनके घर में श्राध्द था और श्राध्द के निमित्त विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जा रहे थे। सारा वातावरण  व्यंजनों की सुगंध से महक रहा था।

तभी एक निर्धन परिवार वहां से गुजरा। उस परिवार में माता-पिता और चार छोटे –छोटे बच्चे थे। वे लोग कई दिनो से भूखे थे। ऐसे में भोजन कि सुगंध से बच्चे मचलने लगे। एक लड़के से रहा न गया। वह बोला,” माँ! कैसी अच्छी सुगंध हैं। व्यंजन बहुत स्वादिष्ट लगते होंगे?”

माँ ने उदास स्वर में कहा,” बेटा! हमारा ऐसा भाग्य कहां कि हम स्वादिष्ट व्यंजन खांए? हमें तो उनकी सुगंध भी दुर्लभ है।

घर के बाहर खड़े संत एकनाथ ने मां  और लड़के की यह बात सुन ली। उन्होंने सोचा कि जब हर शरीर ईश्वर का है तो उनके व्दारा किए गए भोजन से भी भगवान को ही भोग लगेगा। अत: उन्होंने उस निर्धन परिवार को बुलाया और पत्नि से भोजन कराने को कहा। पत्नि ने सारे परिवार को भर पेट भोजन करवाकर विदा किया।

श्राध्द नियम के अनुसार पुन: सारे व्यंजन बनाए गए। निमंत्रित ब्राह्मणों को जब इस घटना का पता चला तो उन्होंने श्राध्द भोज में आने से इंकार कर दिया। संत एकनाथ ने विनम्रतापूर्वक उन्हें पूरी बात समझाने का प्रयत्न किया परंतु ब्राह्मण अपने निर्णय पर अटल रहे। ऐसे में एकनाथ जी श्राध्द भोज कि चिन्ता करने लगे।

तभी घर के एक सेवक ने कहा,” जब आप ने यह रसोई पितरों के लिए बनाई है तो फिर सीधे उन्हें ही आमंत्रित क्यों नही करते। वे स्वयं आकर अपना भाग ग्रहन कर लेगे।“

यह सुनकर एकनाथ जी ने ऐसा ही किया। पतले सजाई गई और पितरों को आमंत्रित किया गया। कहते है कि उनके तीन पितरों ने प्रत्यक्ष आकर भोजन ग्रहण किया और उन्हें बहुत-बहुत आशीर्वाद देकर अतंर्धान हो गए।

जाति एवं दभं से ग्रस्त ब्राह्मण यह नहीं समझ सके कि श्राध्द श्रध्दा से अर्पित किया गया भोग होता है। यदि श्रध्दा सच्ची हो तो सब जीवों में बसने वाले प्रभु प्रसन्न होते है। ऐसे में पितर संतृप्त होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।

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